मंत्रिमंडल विस्तार से टूटी सत्ता परिवर्तन की पुरानी परिपाटी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से देखी जा रही थी और यह अस्थिरता एक अजीब परंपरा का रूप ले चुकी थी। प्रदेश में भाजपा की सरकार के समय राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा रही है। लेकिन वर्तमान में फिलहाल इस पर विराम लग गया है ऐसा राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है।
बता दें कि लंबे समय से भाजपा के शासनकाल में नेतृत्व परिवर्तन की परंपरा रही है। अभी तक प्रदेश में जब-जब भाजपा की सरकार रही तब-तब सरकार के कार्यकाल का अंतिम वर्ष आते-आते नेतृत्व परिवर्तन लगभग तय मान लिया जाता था और यह परंपरा जैसी बन गई थी। लेकिन वर्तमान में भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है का संदेश आमजन तक जा चुका था। ऐसे में भाजपा हाईकमान को उचित फैसला तो लेना ही था। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो भाजपा में उपजे असंतोष का ही परिणाम है कि प्रदेश सरकार को अंतिम वर्ष में मंत्री पद बांटने पडे़।
माना जा रहा है कि प्रदेश में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के आदेश पर प्रदेश में चार सालों के इंतजार के बाद कैबिनेट विस्तार किया गया। इसके साथ ही प्रदेश में चल रही तमाम अटकलों पर लगाम लगने का संदेश भी दिया है। ज्ञात हो कि धामी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को रिपीट कर स्थिरता का संदेश दिया था और अब पांचवें वर्ष में मंत्रिमंडल विस्तार कर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सरकार परंपरागत राजनीति से अलग, आत्मविश्वास और प्रदर्शन की राजनीति पर चल रही है। वही दूसरी ओर जहां विरोधी दल यह अनुमान लगा रहे थे कि इतिहास खुद को दोहराएगा और धामी को भी बदला जाएगा। लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होगा दिख नहीं रहा है। अगर ऐसा होता तो चुनावी साल में मंत्रीमंडल विस्तार नहीं होता।
सूत्रों की माने तो भाजपा हाईकमान ने मंत्रिमंडल विस्तार कर राजनीतिक संदेश दिया है कि भाजपा में सब ठीक है। फैसले ने एक और संकेत साफ कर दिया है भाजपा अब उत्तराखंड में नेतृत्व को लेकर किसी प्रयोग के मूड में नहीं है। धामी केवल वर्तमान के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति के केंद्र बिंदु बन चुके हैं। इसके साथ ही धामी की छवि को ‘स्थायी नेतृत्व’ है का संदेश दिया है।
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